Thursday, January 31, 2019

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते

सटीक जवाब पाने के लिए ज़्यादा बड़े सैम्पल साइज़ पर रिसर्च की जा रही है. इसके बाद ये भी सुनिश्चित किया जा सकेगा कि किस शख़्स को कौन से प्रोबायोटिक्स लेने चाहिए.
सेहतमंद ज़िंदगी जीने में शरीर के भीतर पलने वाले जीवाणुओं का बहुत बड़ा और अहम रोल होता है.
बच्चे की पैदाइश के चंद हफ़्तों बाद ही तय हो जाता है कि बच्चा कितना सेहतमंद रहने वाला है.
लिंडसे हाल क्वाडरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ बायोसाइंस की माइक्रोबायोम रिसर्च लीडर हैं.
लिंडसे हाल का कहना है कि बच्चे की पैदाइश के समय सबसे पहले उसका वास्ता बच्चेदानी से निकलने वाले पानी से होता है, जिसमें सबसे ज़्यादा बैक्टीरिया होते हैं.
"ये बैक्टीरिया बच्चे की सेहत के लिए ज़्यादा ज़रूरी होते हैं. इसीलिए क़ुदरती तौर पर पैदा बच्चों की रोग निरोधक क्षमता ऑपरेशन से पैदा बच्चों की तुलना में ज़्यादा होती है."
ऑपरेशन से पैदा बच्चे तमाम ज़रूरी माइक्रोबायोम हवा या त्वचा से लेते हैं और कुछ को उनका शरीर ख़ुद पैदा करता है.
जबकि क़ुदरती तौर पर पैदा बच्चों की बड़ी आंत में मां के पेट से मिले ज़रूरी बैक्टीरिया और माइक्रोबायोम मौजूद होते हैं.
हाल की रिसर्च बताती हैं कि अगर शुरुआत में ही बच्चे के पेट का सिस्टम गड़बड़ हो गया तो उसे जीवन भर इसका भुगतान भरना पड़ता है.
रिसर्च में ये भी पाया गया है कि ऑपरेशन से पैदा बच्चों में तमाम तरह की एलर्जी का शिकार होने की क्षमता ज़्यादा होती है.
साथ ही वो हरेक तरह के इको-सिस्टम में ख़ुद को आसानी से ढाल नहीं पाते और जल्दी-जल्दी बीमार हो जाते हैं.
बाइफ़िडोबैक्टीरियम बच्चों की सेहत से जुड़ा कई तरह के बैक्टीरिया का ग्रप है जो उनकी बड़ी आंत में पाया जाता है.
ये बैक्टीरिया बच्चे का पेट साफ़ रखने में मददगार होते हैं. मां के दूध में बाइफ़िडोबैक्टीरियम बड़ी संख्या में मौजूद रहते हैं.
जबकि, फ़ॉर्मूला बेस्ड या डिब्बाबंद दूध पीने वाले बच्चों में ये नहीं होते. इसीलिए मां का दूध बच्चे के लिए बहुत ज़रूरी है.
वैज्ञानिक सेहतमंद आंत के माइक्रोबायोम को दूसरे लोगों में ट्रांसप्लांट से इलाज करने की कोशिश कर रहे हैं.
माना जा रहा है कि ऐसा करने से नई तरह के बहुत से माइक्रोबायोम पैदा किये जा सकेंगे, जो शरीर में ही मौजूद ख़राब कीटाणुओं से लड़ने में सक्षम होंगे.
इसमें कोई शक नहीं कि एंटी-बायोटिक्स आंत के माइक्रोबायोटा को बदल देती हैं.
आंत में ऐसे अनगिनत फ़ायदा पहुंचाने वाले बैक्टीरिया होते हैं, जो बीमारी देने वाले कीटाणुओं के संपर्क में आकर कई तरह के इन्फ़ेक्शन पैदा कर सकते हैं.
इन्हें एंटीबायोटिक के असर से बचाने के लिए वैज्ञानिक क़ुदरती तरीक़े तलाश रहे हैं.
आपको जानकर हैरानी होगी कि हमारी आंत और दिमाग़ के काम करने के तरीक़े में गहरा रिश्ता है.
रिसर्च में पाया गया है कि अगर आंत में सही तादाद में अच्छे माइक्रोबायोम नहीं हैं, तो दिमाग़ का सही विकास होने में मुश्किल होती है.
हालांकि अभी ये पता नहीं लग पाया है कि आंत के कौन से बैक्टीरिया दिमाग़ के विकास के लिए ज़रूरी हैं.
रिसर्चरों का कहना है कि आंत के माइक्रोब्स ऐसे न्योरोट्रांसमीटर्स पैदा कर सकते हैं जो इंसान के दिमाग़ में पाए जाते हैं.
इसमें सेरोटोनिन भी शामिल हैं जो हमारा मूड तय करने में अहम रोल निभाते हैं.

Tuesday, January 15, 2019

توصلت دراسة إلى أن هناك في المتوسط 102 رسالة غير مقروءة في صندوق البريد الإلكتروني للأشخاص

ويقول نيف إن مستوى تأثير الاحتفاظ بمواد رقمية يتفاوت بين شخص وآخر حسب قدرة التحمل، "فإذا وصل الشخص إلى مرحلة أصبح لا قِبل له بتراكم البيانات ولا سبيل لاسترجاع المطلوب الذي بات بحكم الضائع.. فهذا كله قد يؤشر على وجود مشكلة".
ولكن ما السبب في وقوعنا في الورطة في المقام الأول؟ تقول أورافيتش إن منتديات الاحتفاظ بالملفات مثل "غوغل درايف" تسهل علينا الوقوع في براثن التخزين بإفراد المساحة للزج بالملفات باستمرار دون النظر فيها، "فيظن المرء أن المادة في الحفظ والصون إن رغب في استرجاعها، ما يمنح شعورا زائفا بالاطمئنان".
وما أكثر وسائل التخزين المتاحة، فقد أورد المشاركون في دراسة سيديرا للتخزين المرضي للمعلومات أن لديهم متوسطا سعة تخزين 3,7 تيرابايت.
ويظن البعض أن على شركات التكنولوجيا المساعدة في حل المشكلة التي سهلت حدوثها في المقام الأول، فيما يعتقد سيديرا أن المستقبل سيشهد قريبا وسائل متعددة للأرشفة وتنسيق البيانات بين الأجهزة المختلفة، كالمتوافر حاليا من تشارُك أرقام وعناوين المعارف عبر مختلف التطبيقات.
وتوافق أورافيتش أن بإمكان شركات التكنولوجيا المساعدة بتعديل الطريقة التي يتم بها تخزين الملفات، ولكنها تؤكد ضرورة اضطلاع الأفراد بمسؤوليتهم في التعامل مع مقتنياتهم الرقمية من تنسيق وتنظيم باعتباره شرا لا بد منه.
وتخفف من وقع الأمر بقولها إن على المرء النظر إلى الوقت والجهد المستنفد في سبيل ذلك كاستثمار في المستقبل، مستشهدة بعمة لها توفيت مؤخرا عن عمر 100 سنة، وكانت قد حرصت على تجميع ستة ألبومات من الصور تؤرخ لحياتها بالكامل.
وتقول: "كانت تنتقي وترتب الصور من كثير من الصور التي التقطتها في العطلات والتجمعات العائلية ما ساعدها على الخروج بذاكرة ذاتية قوية".
وبدلا من أن نلوم أنفسنا على الكم الهائل من الرسائل غير المقروءة والصور، فلنخصص وقتا نستعيد فيه سيطرتنا شيئا فشيئا على أشجار تلك الغابة الإلكترونية التي تحيط بنا.
بدأ دارشانا سيديرا الأستاذ المشارك بجامعة موناش الأسترالية بحثه في فكرة داء التخزين الرقمي بتوجيه هذا السؤال لعدد من الأشخاص، ووجد أن جميعهم تقريبا ردوا بالإيجاب من حيث أنهم أرادوا مراجعة شيء ولم يجدوه وسط خضم رقمي.
وفي دراسة نشرت مؤخرا سأل نيف وزملاؤه 45 شخصا عن كيفية تعاملهم مع رسائلهم الإلكترونية والصور والملفات الرقمية الأخرى، وتراوحت الأسباب التي ساقوها بين مجرد التكاسل عن حذف القديم، والاعتقاد بإمكان الاستفادة منه في المستقبل، وخشية محو شيء والتضرر من عدم وجوده لاحقا، بل وحتى استخدام بعض الرسائل والملفات كـ"سلاح" بوجه الآخرين.
واستعان فريق البحث بتلك الردود للخروج بمجموعة أسئلة تقييمية للسلوك المرضي للتخزين الرقمي في محيط العمل، واختبروا الأسئلة على 203 أشخاص تتطلب أعمالهم استخدام الكمبيوتر. وأظهرت نتائج دراستهم أن الرسائل الإلكترونية مثلت مشكلة خاصة إذ احتفظ المشاركون في المتوسط بـ 102 رسالة غير مقروءة و331 رسالة مقروءة ببريدهم الإلكتروني.